Saturday, February 19, 2011

बेचैनी में क़रार है , क़रार से बेक़रारी
ख़ुद से अनजान हूँ जानू में क्या किसी को
अज़ल

Sunday, January 23, 2011

किसी नज़ारे में क्या देखता हूँ
ज़र्रे में अहले जहाँ देखता हूँ

इश्क को इश्क मिले तो ग़ैब ग़ैब इश्क
तगाफुल में तेरे, इश्क सोंकता हूँ

तीरों से अपने तू बेखबर सही
ज़ख्म ए सबब से दवा खेंचता हूँ

जाता हूँ पहचाना नाम ओ शक्ल से
और बेशुमार अपने सुराग़ देखता हूँ

सिर्फ मैं ही नहीं यहाँ बेकरार
परीशां मंज़र को मैं खोजता हूँ

हुबाब की सी हस्ती से दिल रजामंद
दिमाग के लम्बी दलीलें टटोलता हूँ

सहारे अलफ़ाज़ के खला खेंचता हूँ
हर्फों से अपनी खमोशी ढूँढता हूँ
अज़ल

Sunday, November 28, 2010

दिल ही दिल क्यों कोई गवाह दूंड़े
काफी है ग़र आईने में हिसाब रखे
अज़ल

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क्यों फिर दिमाग उलझे तारों के जाल में
येही मंजिल के उसके नक़्शे पा, पा न पाउँगा
दिख कर भी न दिखे जुज्व में कुल मुझे
ये ख्वाहिशे एक दागे में पिरो न पाउँगा
अज़ल

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