Friday, October 26, 2007

मरासिम

देखिया मौत के मायने बदलिए
ज़िंदगी और मौत के मरासिम समझिये
बड़ी मुख्तसर सी बात है जनाब
अगर दिन न हो तो किसे कहें रात ,

मरना और जीना , एक हुनर की बात है ,
वो हुनर बिरले ही किसी को हासिल है ,
एक दूजे के कायल है ये ,
जो जिए शान से वो मरे शान से ,

बस एक अपना सफर है ये ,
सिर्फ अपनी बात होती है ,
जो जीना सीख ले अपनी तरह से ,
वो मौत से फिर शिक़ायत क्यों करे

मौत को दावत तो दीजिए ,
फिर ज़िंदगी के मजे देखिए
जब मौत के करीब ज़िंदगी जायेगी
तब खुद को थोड़ा समझ पायेगी

बच बच के भाई कुछ न होगा
बाहर कुछ है ही नहीं बचने लायक
सोच का फेर है सारा जहाँ और
खुद से कोई बचा नहीं अब तक


अज़ल
बात वो जिसकी कोई शर्त न हो
वज़ह -ए - जीस्त सिर्फ मोहब्बत हो

आजादी -ए -सोच की कैद है सक्त
निजात दिमाग से मिले तो इबादत हो

पल भर की ज़िंदगी फिक्र में क्यों कटे
खुले चश्म मेरे वहाँ जहाँ ठहरा वक़्त हो

अज़ल

Monday, October 22, 2007

मेरी ताक़त में तेरा ज़ओफ़ भी शामिल है
मेरे दिनों में थोडी रात भी शामिल है

जब हँसता हूँ बेधडक ज़रा गौर से देख
इन आखों की चमक में थोड़ा अश्क भी शामिल है

फिक्र ऐसी जहाँ की सब उठाय हैं फिरते
लगता है सब सबों में शामिल हैं

मेरी तौबा पर जो हो शिकेब इतने
आगाज़ इसमे नई लत का शामिल है

देख कर तुझे जो मुझे फिर कुछ न दिखा
हुस्न में तेरे मेरी सोच भी शामिल है

हाय ! सोचा न था गुजरूँगा इस राहगुज़र से भी
इस हाल में माज़ी तो क्या मेरा मुस्तकबिल शामिल है

हुस्न तेरा अभी देखा कहाँ
जिसे अफवाह भी छू गयी वो यहाँ कहाँ

पर्दा जहाँ का यहाँ जाना कहाँ
दिखता है वो साफ पर दिखे कहाँ

मर्दों को ढूँढ रही है क्यामत की नज़र
साधे जो क्यामत को वो दस्त ओ बाज़ू कहाँ

कह कह न थके लोग तन्हाई के किस्से
हम खोज में पागल यहाँ वक़्त कहाँ

पैसे चुका दीजिय पढिये औरों के नज़रिये
इल्म ए मोहब्बत की यहाँ फ़ीस कहाँ