Azal
Sunday, November 28, 2010
दिल ही दिल क्यों कोई गवाह दूंड़े
काफी है ग़र आईने में हिसाब रखे
अज़ल
क्यों फिर दिमाग उलझे तारों के जाल में
येही मंजिल के उसके नक़्शे पा, पा न पाउँगा
दिख कर भी न दिखे जुज्व में कुल मुझे
ये ख्वाहिशे एक दागे में पिरो न पाउँगा
अज़ल
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